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भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने 23 अप्रैल और 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी ने देश की संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का काम किया है। उन्होंने विशेष गहन संशोधन यानी SIR को लेकर भी विपक्ष पर सवाल उठाए और कहा कि यह मुद्दा राजनीतिक लाभ के लिए उठाया जा रहा है। इस पूरे विवाद के बीच संवैधानिक व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है, जिसमें संवैधानिक शब्द केंद्र में बना हुआ है।
दरअसल, दुबे ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने कहा कि SIR कोई नया Concept नहीं है और पहले भी इस पर काम होता रहा है। उनके मुताबिक, संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन विपक्ष इसे गलत तरीके से पेश कर रहा है। ऐसे में संवैधानिक व्यवस्था को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है।
दुबे ने अपने बयान में कई पुराने उदाहरण भी दिए और कहा कि कांग्रेस के समय में कई संवैधानिक पदों पर रहे लोग बाद में राजनीतिक भूमिकाओं में आए। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ने कभी भी संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ महाभियोग जैसी कार्रवाई की मांग नहीं की। वहीं उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे लगातार संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाते हैं, जिससे आम जनता में गलत संदेश जाता है।
वहीं चुनाव आयोग द्वारा चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा, जबकि केरल और असम में 9 अप्रैल को वोटिंग होगी। तमिलनाडु में 23 अप्रैल और पुडुचेरी में भी 9 अप्रैल को मतदान तय किया गया है। इन सभी राज्यों के लिए मतगणना 4 मई को होगी। ऐसे में संवैधानिक प्रक्रिया के तहत चुनावी तैयारियां तेज हो गई हैं।
ऐसे में अब सवाल यह है कि इस बयानबाजी का चुनावी माहौल पर क्या असर पड़ेगा। जानकारों के अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं को लेकर उठे विवाद से राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। इससे मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति भी बन सकती है। हालांकि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए प्रक्रिया को पारदर्शी रखने पर जोर दे रहा है, ताकि मतदान निष्पक्ष तरीके से हो सके।
इसी बीच राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जिससे आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्मा सकता है। दुबे के बयान ने संवैधानिक बहस को नई दिशा दी है, वहीं विपक्ष इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने की तैयारी में है। चुनावी तारीखों के नजदीक आते ही यह मुद्दा और अधिक प्रमुख हो सकता है, जिससे राजनीतिक रणनीति और मतदाताओं के रुझान दोनों प्रभावित होने की संभावना है।












