
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर तीखा हमला बोला है। यह आलोचना अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर उच्च टैरिफ की चेतावनी के बीच सामने आई है। अमेरिका ने यह चेतावनी भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखने को लेकर दी है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सरकार पर व्यक्तित्व केंद्रित विदेश नीति अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस नीति से देश को ठोस लाभ नहीं मिल पाया है।
जयराम रमेश ने एक लेख में प्रधानमंत्री के व्हाइट हाउस में ‘अच्छे दोस्त’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका का भारत के प्रति रवैया गर्मजोशी और ठंडेपन के बीच झूलता रहता है।
रमेश ने व्यापार और ऊर्जा मुद्दों पर अमेरिकी धमकियों का उल्लेख किया। अमेरिका ने फिर से भारत से आयात पर उच्च टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह धमकी इस शर्त पर है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा।
उन्होंने पिछले कुछ वर्षों की उच्चस्तरीय कूटनीति की भी आलोचना की। नमस्ते ट्रंप और हाउडी मोदी जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए रमेश ने कहा कि इन सबका बहुत कम फायदा हुआ है।
उन्होंने जबरदस्ती के गले मिलने और अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रशंसा वाले सोशल मीडिया पोस्ट का भी उल्लेख किया। रमेश का मानना है कि इन सबसे कोई खास लाभ नहीं मिला।
यह टिप्पणियां भारत अमेरिका व्यापार संबंधों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच आई हैं। अमेरिका भू राजनीतिक तनाव के मद्देनजर रूस के साथ ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों पर दबाव बढ़ा रहा है।
भारत का तर्क है कि रूसी कच्चे तेल की रियायती खरीद एक संप्रभु निर्णय है। इसका उद्देश्य सस्ती ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। भारत का कहना है कि ये लेनदेन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का पालन करते हैं।
मोदी सरकार भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर देती है। सरकार रक्षा सहयोग, तकनीकी सहयोग और बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार का हवाला देती है।
लेकिन कांग्रेस का कहना है कि इन उच्चस्तरीय सार्वजनिक आयोजनों का भारत के लिए नीतिगत लाभ में स्थिरता से तब्दील नहीं हुआ है। रमेश की टिप्पणियां विपक्ष की व्यापक चिंताओं को दर्शाती हैं।
विपक्ष को चिंता है कि भारत की विदेश नीति नेताओं के बीच व्यक्तिगत रसायन पर बहुत अधिक निर्भर हो गई है। उनका मानना है कि मजबूत संस्थागत कूटनीति के बजाय यह निर्भरता खतरनाक है।
इससे भारत अमेरिकी व्यापार और टैरिफ नीतियों में अचानक आने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील हो गया है। आगे टैरिफ बढ़ने की संभावना से यह मुद्दा और गर्मा सकता है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज होने की उम्मीद है। बहस का केंद्र यह होगा कि भारत वैश्विक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने के बीच रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों का संतुलन कैसे बनाएगा।
यह एक जटिल चुनौती है जिस पर सभी पक्षों की नजर टिकी हुई है। देश की आर्थिक और कूटनीतिक दिशा इसी बहस से तय हो सकती है।










