अमेरिका और भारत के बीच हुए व्यापार समझौते से उत्पन्न आशावाद के बावजूद, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारतीय रुपया आने वाले समय में कमजोर ही रहेगा। विदेशी निवेशकों की निकासी और चालू खाते के घाटे का दबाव रुपये पर बना रहेगा।
तीन फरवरी को रुपये ने सात साल का अपना सबसे अच्छा दिन देखा था। इसकी वजह थी अमेरिका द्वारा भारत को व्यापार प्राथमिकता कार्यक्रम से हटाने की धमकी पर रोक लगाना। इस खबर के बाद रुपया 0.8 प्रतिशत मजबूत हुआ और 71.18 प्रति डॉलर पर पहुंच गया।
लेकिन यह तेजी अल्पकालिक साबित हो सकती है। एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने कहा कि यह सौदा रुपये के मूलभूत कमजोर पहलुओं को नहीं बदलता। उनके अनुसार, रुपया लंबी अवधि में कमजोर ही रहेगा।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक पिछले साल भारतीय बाजारों से भारी मात्रा में पैसा निकाल चुके हैं। यह प्रवाह उनके लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। इस वजह से रुपये पर दबाव बना रहता है।
इसके अलावा, भारत का चालू खाता घाटा भी एक गंभीर मुद्दा है। यह घाटा रुपये की मूल्यह्रास की प्रक्रिया को और तेज कर सकता है। अर्थव्यवस्था के ये दोनों पहलू मिलकर रुपये की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी सौदे से कुछ राहत मिली है। लेकिन यह राहत अस्थायी है और दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान नहीं करती। रुपये की मजबूती के लिए और अधिक ठोस आर्थिक उपायों की आवश्यकता है।
वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल भी रुपये के लिए अनुकूल नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कारक भी भारतीय मुद्रा को प्रभावित कर रहे हैं। इन सभी परिस्थितियों में रुपये का भविष्य चिंताजनक लगता है।
विदेशी मुद्रा भंडार में उतार चढ़ाव भी रुपये की स्थिरता को प्रभावित करता है। भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता रहता है। लेकिन ये हस्तक्षेप अक्सर अल्पकालिक राहत ही प्रदान कर पाते हैं।
तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव का भी भारत के चालू खाता घाटे पर सीधा असर पड़ता है। भारत तेल का एक बड़ा आयातक देश है। तेल महंगा होने से घाटा बढ़ता है और रुपया कमजोर होता है।
वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की प्रवृत्ति भी रुपये को प्रभावित करती है। जब वैश्विक बाजारों में जोखिम बढ़ता है तो निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकाल लेते हैं। इससे रुपये पर दबाव बनता है।
भारत सरकार और आरबीआई रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। इनमें विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन और नीतिगत उपाय शामिल हैं। फिर भी, बाहरी कारकों का दबाव बरकरार है।
अर्थशास्त्री सलाह देते हैं कि निवेशकों और व्यवसायियों को रुपये में और गिरावट की संभावना के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्हें अपनी विदेशी मुद्रा जोखिम प्रबंधन रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। यह समय सतर्कता बरतने का है।
भविष्य में रुपये की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें वैश्विक आर्थिक स्थिति, घरेलू आर्थिक सुधार और सरकार की नीतियां शामिल हैं। इन सभी का संयुक्त प्रभाव रुपये के भाग्य का फैसला करेगा।
रुपया एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। अमेरिका के साथ हुए सौदे से मिली राहत केवल एक छोटी सी खुशखबरी है। रुपये की असली लड़ाई आर्थिक मोर्चे पर जारी रहेगी।









