
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्ज़ामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि NEET-PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल घटाए जाने के बाद 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं।
शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में NBEMS ने यह जानकारी दी। बोर्ड ने यह भी कहा कि इस स्टेज पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप सीधे इन उम्मीदवारों को प्रभावित करेगा।
हलफनामे में साफ कहा गया, ‘कट-ऑफ घटाए जाने के परिणामस्वरूप यह स्पष्ट है कि 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार अब NEET PG 2025 की काउंसलिंग में भाग लेने के लिए पात्र हो गए हैं।’
NBEMS ने अपने हलफनामे में यह भी खुलासा किया कि कट-ऑफ घटाने के फैसले में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। यह फैसला स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज और नेशनल मेडिकल कमीशन के विशेष दायरे में आता है।
यह हलफनामा एक याचिका के जवाब में दायर किया गया था। इस याचिका में NBEMS के NEET-PG 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल को काफी घटाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक अराधे की पीठ ने 4 फरवरी को सरकार, NBEMS, नेशनल मेडिकल कमीशन और अन्य को नोटिस जारी किए थे।
देश भर में 18,000 से अधिक पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली रहने के कारण बोर्ड ने NEET-PG 2025 एडमिशन के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में संशोधन किया।
आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ 40 पर्सेंटाइल से घटाकर शून्य कर दिया गया है। इसका मतलब है कि 800 में से माइनस 40 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार भी पीजी मेडिकल सीटों की तीसरी राउंड काउंसलिंग में भाग ले सकेंगे।
NBEMS द्वारा प्रकाशित नोटिस के अनुसार, जनरल कैटेगरी के लिए NEET PG कटऑफ 50 पर्सेंटाइल से घटाकर सात पर्सेंटाइल कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, डॉ सौरव कुमार, डॉ लक्ष्य मित्तल और डॉ आकाश सोनी द्वारा दायर याचिका पर विचार कर रही है।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि कट-ऑफ में यह कमी संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है। उनका मानना है कि यह फैसला मेरिट के सिद्धांत के खिलाफ है।
इस पूरे मामले ने मेडिकल शिक्षा के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हज़ारों अतिरिक्त उम्मीदवारों के पात्र होने से काउंसलिंग प्रक्रिया पर भी दबाव बढ़ेगा।
खाली पड़ी सीटों को भरने का यह प्रयास चिकित्सा क्षेत्र में विशेषज्ञों की कमी को दूर करने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। हालांकि, गुणवत्ता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला हजारों मेडिकल छात्रों के करियर का रास्ता तय करेगा। यह फैसला देश की मेडिकल शिक्षा नीति के लिए एक अहम मिसाल भी कायम करेगा।
इस बदलाव से उन उम्मीदवारों को एक नया मौका मिला है जो पहले कट-ऑफ पार नहीं कर पाए थे। अब वे भी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल हो सकेंगे।
मेडिकल शिक्षा के इस नए चरण में गुणवत्ता और पहुंच के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी ज़रूरत है। सभी हितधारकों को मिलकर एक स्थायी समाधान खोजना होगा।










